श्रीसद्गुरु आशीषवचनम्
— “प्रभुश्री की लेखनी से” —
12 जुलाई, 2025 (शनिवार)
भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
– मुण्डकोपनिषद् २.२.८
यह मंत्र मुण्डकोपनिषद् के द्वितीय मुण्डक का अन्तिम श्लोक है, जो आत्म-दर्शन की त्रिविध फलश्रुति को अत्यन्त मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से उद्घाटित करता है। आत्मा का “परावरे दृष्टि” जब जड़ और चेतन, हीन और परा, सकल और निष्कल ब्रह्म का एकत्व प्रत्यक्ष होता है – तब साधक के जीवन में ऐसा भीतरी क्रान्तिकारी रूपान्तरण होता है, जो सम्पूर्ण बन्धनों को काट देता है।
“भिद्यते हृदयग्रन्थिः” —
भगवत्पाद शंकराचार्य ‘हृदयग्रंथि’ को अविद्या, अहंता, ममता और देहाभिमान का गाँठ कहते हैं। यह वही गाँठ है जो आत्मा को देह, मन, कर्तृत्व और संसार से बाँधती है। आत्मदर्शन से यह गाँठ स्वतः भस्म हो जाती है।
“छिद्यन्ते सर्वसंशयाः” — जो भी तर्क, शंका, मतभेद, द्वैत और भ्रम आत्मा-ब्रह्म को लेकर होते हैं, वे सभी आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश में छिन्न हो जाते हैं। शास्त्रार्थ और विवाद वहाँ समाप्त हो जाते हैं, जहाँ साक्षात् अनुभव आरम्भ होता है।
“क्षीयन्ते चास्य कर्माणि” —
आत्मज्ञानी के लिए कर्मबन्धन — जो पुनर्जन्म का कारण हैं — नष्ट हो जाते हैं। संचित और आगामी कर्म निष्फल हो जाते हैं; केवल प्रारब्ध शेष रहता है, वह भी भोग मात्र बन जाता है।
“तस्मिन् दृष्टे परावरे” —
यह सब तब होता है, जब साधक उस ब्रह्म को देखता है, जो “पर” (श्रेष्ठ, निर्गुण) और “अवर” (स्थूल, सगुण) दोनों में एक ही रूप में प्रकाशित होता है।
भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य के अनुसार यह दृष्टि केवल ज्ञान से नहीं, ज्ञाननिष्ठा से उत्पन्न होती है – जब जानने वाला, जानने की प्रक्रिया और ज्ञेय – तीनों लय होकर केवल ब्रह्मस्वरूप रह जाता है।
यह मंत्र अद्वैत के समग्र फल का उद्घोष करता है। आत्मा-ब्रह्म का एकत्व जब अनुभूत होता है, तब अविद्या की गाँठ खुलती है, द्वैतजन्य संदेह मिटते हैं और कर्मफल का चक्र समाप्त हो जाता है। यह न केवल मुक्ति का सिद्धान्त है, अपितु मुक्ति की जीवन्त अनुभूति है।
मुण्डकोपनिषद् का यह मंत्र एक आत्मज्ञान की दीपशिखा है, जो साधक के भीतर के समस्त बन्धनों को जला देती है। हृदय की गाँठें खुलती हैं, भ्रम मिटते हैं और कर्म बन्धन विलीन हो जाते हैं – जब ब्रह्म का दर्शन होता है – “तस्मिन् दृष्टे परावरे” जो घट-घट में भी है और उस पार ब्रह्मलोक में भी।
यह ही अद्वैत का वाङ्मय बोध है — “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म” जिसे देखकर न कुछ शेष रहता है, न कुछ जानना बाकी रहता है।
