भगवद्पादचार्य आद्य शंकराचार्य के अनुसार, ब्रह्म शब्दातीत, अव्यवहित और निर्गुण है
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः परः ॥
– मुण्डकोपनिषद् २.१.२
May be an image of 1 person, temple and text that says "दिव्यो हयमूर्त: पुरुष: स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। अप्राणो ह्यमना: शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः पर:।। -मुण्डकोपनिषद् २.१.२ वह निराकार, दिव्य पुरुष भीतर- सर्वत्र व्याप्त है अजन्मा, प्राण-रहित, मन से परे और अक्षर से भी परे परम सत्य है भगवद्पाद आद्य शंकराचार्य कहते हैं कि यह सर्वोच्च तत्व निर्मल, अनन्त और माया से अदूता है इसे जानना ही मुक्ति है। जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरी जी महाराज f AvdheshanandG AvdheshanandG_ Official"
मुण्डकोपनिषद् के इस महामंत्र में उपनिषदकार हमारी दृष्टि को संसार के रूप और सीमाओं से परे ले जाते हैं। यहाँ जिस पुरुष की वन्दना है, वह आकार, जन्म, प्राण, मन तथा सभी उपाधियों से रहित है, वही परम तत्व है, वही परम् ब्रह्म है और वही परम् शिव है। यह दिव्य पुरुष न केवल बाहरी जगत में व्याप्त है, बल्कि हमारे भीतर के गूढ़तम रहस्य में भी वही नित्य और अजन्मा है। एक साथ भीतर-बाहर सर्वत्र रहते हुए वह किसी सीमा में बँधता नहीं; अमूर्त, अप्रमेय और अविनाशी है ।
भगवद्पाद भाष्यकार भगवान शंकराचार्य इस मंत्र के गूढ़ अर्थ को खोलते हुए कहते हैं कि इस पुरुष के लिए न जन्म है, न मरण; न प्राण है, न मन। वह केवल प्रकाशमय शुभ्रता है — एक अद्वैत चैतन्य, जिसमें सत्त्व, रज, तम किसी का लेश मात्र नहीं। प्राण, इन्द्रियाँ, मन ये सभी उपाधियाँ हैं, जबकि वह उपाधिरहित सत्य है।
वह “अक्षर” से भी परे है – उस अविनाशी बीज से, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति होती है। वह माया के पार विराजमान है, और इसी कारण कहा गया है – “अक्षरात् परतः परः” – अर्थात् वह परम से भी परम है।
इस मंत्र में उपनिषद् ब्रह्म के जिस रूप का उद्घाटन करता है, वह हमारी क्षुद्र कल्पना से बहुत परे है। इसका अभिप्राय है कि शब्द, विचार, इन्द्रियों से न पकड़ में आने वाला वह सत्य, नित्य-शुद्ध, निर्विकार, सर्वव्यापी है।
भवदपादाचार्य इस गूढ़ रहस्य की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि जिस क्षण साधक उपाधियों से परे उस परम तत्व में अपनी दृष्टि एकाग्र कर लेता है, उसी क्षण उसे अपनी सच्ची सत्ता का बोध हो जाता है और वही आत्म-साक्षात्कार है।
अंततः, इस मंत्र में उपनिषद् हमें उसी अद्वैत सत्य की ओर बुला रहा है – उस निर्मल, अज, अप्राण-अमनः सत्य की ओर, जो हमारी मूल पहचान है। यही हमारे साधना-पथ का चरम लक्ष्य है, जहाँ उपासना से उपासक स्वयं उस परम पुरुष में मिल जाता है, और इस मिलन में ही जीवन का पूर्ण अर्थ साकार होता है।
May be an image of 1 person, temple and text that says "दिव्यो हममूर्त: पुरुष: स बाह्याभ्यन्तरो ह्ाजः। अप्राणो ह्यामना: शुभ्रो ह्यक्षरात् परतः 디: -Mundaka Upanișad 2.1.2 That formless, radiant Purusa pervades all - inside and outside unborn, breathless, beyond mind, and higher than even the imperishable. Adi Shankaracharya explains that this Supreme Reality is pure, limitless, and untouched by Mãyã. Knowing this is liberation. JLRAPE ANPINHAONEIRAK CTИAHBHAЛA ARYANGNANANDLE SWAMI AVDHESHANAND GIRI f AvdheshanandG AvdheshanandG_Official"

By Rahul Rawat

राहुल रावत उत्तराखंड के अलमोडा जिले के रानीखेत क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं. राहुल ने पत्रकारिता एवं जनसंचार में बैचलर किया है. राहुल 4 Iconic Media समूह से पहले एम.एच वन न्यूज, एसटीवी हरियाणा न्यूज, वी न्यूज डिजिटल चैनल, में भी काम कर चुके हैं. करीब 5 साल के इस सफर में दिल्ली, उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब की राजनीति को करीब से देखा, समझने की कोशिश की जो अब भी जारी ही है.राहुल हरियाणा विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक कवर किया है