पश्चिम एशिया एक बार फिर भयंकर तनाव की चपेट में है। ईरान और इस्राइल के बीच शुरू हुआ युद्ध अब वैश्विक स्तर पर संकट का कारण बनता जा रहा है। अमेरिका के सीधे तौर पर इस युद्ध में शामिल होने के बाद स्थिति और गंभीर हो गई है। अमेरिका ने हाल ही में ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमला कर दिया, जिसके जवाब में ईरान ने भी पलटवार की धमकी दी है। ऐसे में भारत, जो दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक देशों में से एक है, इस युद्ध से उत्पन्न जोखिमों को गंभीरता से लेते हुए अपनी तेल आयात रणनीति में बड़ा बदलाव कर चुका है।
तेल के दामों पर मंडराया खतरा
ईरान और इस्राइल के युद्ध ने पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक और निर्यातक देशों की सुरक्षा को संकट में डाल दिया है। विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति की नाड़ी कहा जाता है, वह अब ईरान के प्रतिशोध की धमकियों की सीधी जद में है। गौरतलब है कि भारत का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल इसी जलडमरूमध्य से होकर आता है। यदि यहां से तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो भारत सहित कई देशों के लिए ऊर्जा संकट गहरा सकता है।
ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका युद्ध में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों पर हमले करेगा। इसके अलावा यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में पहले ही जहाजों पर हमले की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इस वजह से खाड़ी देशों से होने वाला तेल आयात जोखिमपूर्ण हो गया है।
भारत ने बढ़ाया रूस से तेल आयात
भारत ने इस भू-राजनीतिक स्थिति को भांपते हुए समय रहते अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव किया है। विश्वव्यापी व्यापार आंकड़े जारी करने वाली संस्था कैपलर के अनुसार, भारत ने जून 2025 में रूस से प्रति दिन 20 से 22 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है। यह पिछले दो वर्षों में रूस से हुआ सबसे बड़ा आयात है। मई 2025 में यह आयात केवल 11 लाख बैरल प्रतिदिन था।
वर्तमान परिदृश्य में भारत अपने कुल कच्चे तेल आयात का 40-44 प्रतिशत हिस्सा रूस से मंगा रहा है, जो युद्ध से पहले महज 1 प्रतिशत था। इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण रूस द्वारा भारत को तेल पर दी जाने वाली भारी रियायतें और भौगोलिक सुरक्षा है। रूस से आने वाले तेल की आपूर्ति मध्य एशिया और समुद्री मार्गों के विकल्प से होती है, जो होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भर नहीं है।

खाड़ी देशों पर निर्भरता में गिरावट
भारत ने परंपरागत रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से कच्चा तेल आयात किया है। लेकिन युद्ध के हालात और होर्मुज जलडमरूमध्य की अस्थिरता को देखते हुए जून 2025 में भारत ने खाड़ी देशों से कुल मिलाकर सिर्फ 20 लाख बैरल प्रतिदिन का ही आयात किया, जो रूस से कम है। इससे साफ है कि भारत अब अपनी ऊर्जा निर्भरता को विविधीकरण की राह पर ले जा रहा है।
भारत सरकार और पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों का मानना है कि पश्चिम एशिया की राजनीतिक अस्थिरता भविष्य में और भी गहरा सकती है, जिसके चलते ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने के लिए वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना आवश्यक है। इसी कड़ी में भारत ने अमेरिका, लैटिन अमेरिकी देशों, अफ्रीका और रूस से तेल आयात को प्राथमिकता दी है।
अमेरिका से आयात में भी बढ़ोतरी
हालांकि अमेरिका से तेल आयात भारत को महंगा पड़ता है, फिर भी भारत ने जून 2025 में अमेरिका से भी अपने आयात को बढ़ाया है। कैपलर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने इस महीने अमेरिका से प्रति दिन 4.39 लाख बैरल तेल मंगाया, जबकि पहले यह आंकड़ा 2.80 लाख बैरल प्रतिदिन था। यह वृद्धि बताती है कि भारत ने संकट की घड़ी में जोखिम विभाजन (Risk Diversification) की नीति को अपनाया है।
अमेरिका से आने वाला तेल पश्चिम एशिया के मुकाबले महंगा जरूर है, लेकिन यह राजनीतिक स्थिरता और भरोसेमंद आपूर्ति का प्रतीक है। यही वजह है कि भारत ने रिफाइनरियों की मिलावट रणनीति को भी बदलते हुए विभिन्न स्रोतों से तेल मंगाना शुरू कर दिया है। भारत की रिफाइनरियां हर दिन करीब 51 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत करती हैं, जिससे पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पाद तैयार होते हैं।
तेल कीमतें बढ़ने की आशंका
विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान और इस्राइल के बीच युद्ध और गहराता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल कीमतों पर पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह स्थिति महंगाई और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ा सकती है।
2022 में जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ था, तब वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। अब ईरान-इस्राइल युद्ध और उसमें अमेरिका की सहभागिता के चलते एक और ऊर्जा संकट की आहट मिल रही है। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी कि वह तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू महंगाई को किस तरह नियंत्रित करता है।
भारत की दीर्घकालिक रणनीति
भारत ने अब दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा नीति पर कार्य शुरू कर दिया है। भारत सरकार पेट्रोलियम भंडारण क्षमताओं को बढ़ा रही है। साथ ही, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे हरित हाइड्रोजन, बायोफ्यूल, एथनॉल ब्लेंडिंग और सौर ऊर्जा पर निवेश को प्राथमिकता दे रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ऊर्जा आत्मनिर्भरता को राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित किया है।
इसके अलावा भारत विदेशों में रणनीतिक तेल भंडारण (Strategic Petroleum Reserves) के लिए भी समझौते कर रहा है। भारत ने संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के साथ मिलकर रणनीतिक तेल भंडारण साझा करने की योजना बनाई है, ताकि वैश्विक संकट की स्थिति में देश की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
ऊर्जा कूटनीति की मजबूती
भारत की ऊर्जा कूटनीति भी इस युद्धकालीन माहौल में बहुत महत्वपूर्ण साबित हो रही है। रूस के साथ दीर्घकालिक अनुबंध, अमेरिका के साथ भरोसे की साझेदारी, अफ्रीका में नए तेल अन्वेषण और मध्य एशिया से पाइपलाइन नेटवर्क के प्रयास इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल आयातक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा समीकरण में एक निर्णायक खिलाड़ी बनना चाहता है।
भारत ने ब्राजील, वेनेजुएला और नाइजीरिया जैसे देशों से भी तेल आपूर्ति समझौते किए हैं। साथ ही भारत अब भारतीय रुपये में भुगतान व्यवस्था को भी बढ़ावा दे रहा है, जिससे डॉलर पर निर्भरता कम हो और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटे।
