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भारत में बेटियों को लेकर सोच चाहे जितनी आधुनिक होने का दावा कर ले, लेकिन जब बात शिक्षा में निवेश की आती है तो सामाजिक मानसिकता आज भी पिछड़ी हुई नजर आती है। शिक्षा मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट ने एक ऐसी सच्चाई उजागर की है, जो देश के भविष्य के निर्माण पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इस रिपोर्ट में यह साफ तौर पर सामने आया है कि अभिभावक बेटों को निजी और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजते हैं, जबकि बेटियों को अभी भी सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, लड़कियों के प्रति यह लैंगिक भेदभाव केवल दाखिले तक सीमित नहीं है, बल्कि संसाधनों के आवंटन और उनकी शिक्षा पर खर्च करने की मानसिकता में भी देखा गया है। इसके बावजूद बेटियां लड़कों की तुलना में बेहतर परिणाम दे रही हैं, जो न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि प्रेरणादायक भी है।

66 बोर्ड के रिजल्ट का विश्लेषण, सामने आया कड़वा सच

यह रिपोर्ट शिक्षा मंत्रालय द्वारा देश के 66 केंद्रीय, राज्य और ओपन स्कूल बोर्डों के वर्ष 2024 के परिणामों के अध्ययन के बाद जारी की गई है। इसका उद्देश्य देश में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता, उपलब्ध अवसरों और लैंगिक असमानता की स्थिति का मूल्यांकन करना था। इस विश्लेषण में सामने आया कि अभिभावकों का नजरिया आज भी लड़कियों की शिक्षा को लेकर उतना सकारात्मक नहीं है जितना होना चाहिए।

लड़कियों को अब भी घर का बोझ, जल्द शादी योग्य या सीमित निवेश की पात्र माना जाता है। यही कारण है कि निजी स्कूलों में अधिकतर बेटे दाखिल हैं, जबकि बेटियां सरकारी स्कूलों की भरोसेमंद दीवारों के पीछे अपना भविष्य संवारने की कोशिश कर रही हैं।

Parents Prefer English Schools for Sons, Government Schools for Daughters: Education Ministry Report 2024

फिर भी बेटियां कक्षा में अधिक उपस्थित, मेहनती और सफल

रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि सामाजिक व आर्थिक रुकावटों के बावजूद बेटियों की उपस्थिति, अध्ययन में गंभीरता और रिजल्ट लड़कों से कहीं बेहतर है। कक्षा 10वीं से लेकर 12वीं तक के परिणामों में बेटियों ने बाज़ी मारी है। विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की बेटियों में जबरदस्त सुधार देखा गया है।

2013 की तुलना में 2025 में 10वीं कक्षा में ST वर्ग की बेटियों की संख्या 81.33 फीसदी बढ़ी है। वहीं, SC वर्ग में 14.75 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है। यह दिखाता है कि शिक्षा का प्रसार अब हाशिए के वर्गों में भी बेटियों तक पहुंच बना रहा है, और वे इसका भरपूर उपयोग कर रही हैं।

पास होने का प्रतिशत भी बेटियों के पक्ष में

जहां एक ओर बेटे सरकारी या निजी स्कूलों में सुविधाएं पाकर भी औसत परिणाम दे रहे हैं, वहीं बेटियां सीमित संसाधनों में भी बेहतर कर रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार:

  • 10वीं में पास प्रतिशत: पिछले 11 वर्षों में SC और ST वर्ग की बेटियों का पास प्रतिशत 68.1% से बढ़कर क्रमशः 79.1% और 118.8% हो गया है।

  • 12वीं में भी शानदार प्रदर्शन: 2013 में 12वीं में भागीदारी 59.8 लाख थी, जो 2024 में 71.7 लाख पहुंच गई — यानी 19.8 फीसदी की वृद्धि। वहीं पास प्रतिशत SC में 252 फीसदी और ST में 159 फीसदी तक बढ़ा है।

अब आर्ट्स नहीं, साइंस है पहली पसंद

एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि बेटियों की पहली पसंद अब पारंपरिक आर्ट्स नहीं बल्कि साइंस स्ट्रीम हो गई है। बीते 11 सालों में विज्ञान विषय से पढ़ाई करने वाली लड़कियों की संख्या 110 प्रतिशत बढ़ी है। इससे भी बड़ी बात यह कि SC वर्ग में यह वृद्धि 142.2 फीसदी और ST वर्ग में 149 फीसदी रही है। यह ट्रेंड दिखाता है कि बेटियां अब मेडिकल, इंजीनियरिंग और टेक्निकल फील्ड की ओर रुख कर रही हैं और भविष्य के नए क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं।

ड्रॉपआउट दर में भी भारी गिरावट

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 10वीं कक्षा में ड्रॉपआउट दर में 47 फीसदी की गिरावट आई है। वर्ष 2013 में यह आंकड़ा 41.53 लाख था, जो अब घटकर 26.6 लाख रह गया है। हालांकि इसमें से 4.43 लाख छात्र परीक्षा ही नहीं देते और शेष 22.17 लाख अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। ओपन स्कूलों की स्थिति फिर भी कमजोर बनी हुई है, जहां 6.98 प्रतिशत ही पंजीकरण होता है और महज 3.4 लाख छात्र उत्तीर्ण हो पाते हैं।

क्या कहती है सरकार?

शिक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यह अध्ययन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की सिफारिशों को लागू करने के लिए किया गया है। इसमें विशेष रूप से यह देखा गया है कि:

  • देश भर के स्कूलों में एक समान पाठ्यक्रम कैसे लागू किया जाए

  • शिक्षकों की योग्यता और ट्रेनिंग की समानता कैसे सुनिश्चित हो

  • मूल्यांकन की एक जैसी पद्धति से सभी छात्रों को बराबर अवसर कैसे मिले

  • राष्ट्रीय दाखिला परीक्षा प्रणाली को कैसे सशक्त किया जाए

इस रिपोर्ट का उद्देश्य सिर्फ यह नहीं है कि नंबर बताए जाएं, बल्कि यह है कि जहां समस्या दिखे वहां नीतिगत हस्तक्षेप हो सके और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकें।

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सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत

इस रिपोर्ट से एक बात तो बिल्कुल साफ है कि बेटियों को उचित अवसर मिलने पर वे किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। लेकिन अभी भी भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा लड़के और लड़की में फर्क करता है। शिक्षा पर खर्च करने से लेकर स्कूल चुनने और विषय निर्धारित करने तक – हर जगह यह भेदभाव देखा जाता है।

रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि सरकारी प्रयासों और बेटियों की मेहनत ने मिलकर कई दीवारें तोड़ी हैं, लेकिन अभी मंज़िल दूर है। जब तक समाज यह नहीं मानेगा कि बेटी भी परिवार की उतनी ही मजबूत नींव है जितना बेटा, तब तक ये आंकड़े सिर्फ आंकड़े ही रहेंगे।

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