जयपुर/बूंदी। राजस्थान में आगामी पंचायती राज चुनावों से पहले सियासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। किसान नेता नरेश मीणा ने बड़ा राजनीतिक दांव चलते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) से समर्थन वापस लेने और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के साथ मिलकर पंचायत चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। आम आदमी पार्टी के चुनाव चिह्न ‘झाड़ू’ पर समर्थकों को चुनाव लड़ाने की कोशिश सफल नहीं होने के बाद अब नरेश मीणा ने बसपा के ‘हाथी’ चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरने का फैसला किया है।
शुक्रवार, 16 अक्टूबर को बूंदी के रामगंज बालाजी क्षेत्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में नरेश मीणा ने अपने फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि पंचायत चुनावों में एक समान चुनाव चिह्न के साथ उतरना जरूरी है, ताकि समर्थित उम्मीदवारों को जनता के बीच एक स्पष्ट राजनीतिक पहचान मिल सके।
AAP की उम्मीदवार सूची पर नरेश मीणा ने उठाए सवाल
नरेश मीणा ने आम आदमी पार्टी के टिकट वितरण पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। दरअसल, आम आदमी पार्टी ने बारां जिले की चार पंचायत समितियों के 41 वार्डों के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची जारी की थी। लेकिन इस सूची में नरेश मीणा के समर्थित उम्मीदवारों को जगह नहीं मिली।
नरेश मीणा का आरोप है कि उनकी ओर से भेजे गए नामों को नजरअंदाज कर दूसरे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई। उन्होंने दावा किया कि इस मामले को लेकर आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह और मनीष सिसोदिया तक अपनी बात पहुंचाई गई, लेकिन बातचीत के बावजूद सहमति नहीं बन सकी।
उन्होंने कांग्रेस नेता प्रमोद जैन भाया पर भी राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
बूंदी, बारां और देवली-उनियारा में BSP के साथ चुनावी तैयारी
नरेश मीणा ने स्पष्ट किया है कि उनका लक्ष्य केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर मजबूत राजनीतिक विकल्प तैयार करना है।
उन्होंने बताया कि बूंदी, बारां और देवली-उनियारा सहित विभिन्न क्षेत्रों में बसपा के समर्थन से उम्मीदवार उतारे जाएंगे। इसके लिए विधानसभा क्षेत्रों में संयोजकों की नियुक्ति और उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।
नरेश मीणा के मुताबिक, बड़ी संख्या में इच्छुक उम्मीदवारों के आवेदन मिल रहे हैं। इनकी जांच के बाद प्रत्याशियों की सूची जारी की जाएगी।
उन्होंने दावा किया कि उनकी रणनीति ऐसी राजनीतिक स्थिति बनाने की है, जिसमें जिला प्रमुख के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को बसपा समर्थित उम्मीदवारों की ताकत का सामना करना पड़े।
मायावती तक पहुंची बात, BSP से मिली हरी झंडी
रिपोर्ट के मुताबिक, नरेश मीणा ने बसपा के प्रदेश नेतृत्व के माध्यम से पार्टी के राष्ट्रीय समन्वयक और सांसद रामजी गौतम तथा बसपा प्रमुख मायावती तक अपना प्रस्ताव पहुंचाया था। इसके बाद बसपा के चुनाव चिह्न पर समर्थित उम्मीदवारों को उतारने की सहमति बनी।
नरेश मीणा का कहना है कि सैकड़ों उम्मीदवारों को निर्दलीय चुनाव लड़ाने पर अलग-अलग चुनाव चिह्न मिलते, जिससे मतदाताओं तक साझा राजनीतिक संदेश पहुंचाना मुश्किल होता। यही वजह है कि उन्होंने एक पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने का रास्ता चुना।
क्या राजस्थान में तीसरे मोर्चे को मिलेगी मजबूती?
राजस्थान की राजनीति में लंबे समय से भाजपा और कांग्रेस का दबदबा रहा है। हालांकि, पंचायत चुनावों में स्थानीय नेताओं, क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।
ऐसे में नरेश मीणा और बसपा के बीच बने नए राजनीतिक समीकरण से खासतौर पर हाड़ौती क्षेत्र की राजनीति में मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
नरेश मीणा किसानों, मजदूरों और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता देने की बात कर रहे हैं। वहीं, बसपा भी इस गठजोड़ के जरिए राजस्थान में अपना राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश में है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नरेश मीणा का यह फैसला बसपा को पंचायत चुनावों में नई ताकत देगा या फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच तीसरे विकल्प की चुनौती सीमित रह जाएगी?
फिलहाल नरेश मीणा के इस सियासी कदम ने राजस्थान के पंचायत चुनावों में नया राजनीतिक समीकरण जरूर खड़ा कर दिया है।
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