बांके बिहारी कॉरिडोर मामले पर ‘सुप्रीम’ सुनवाई
बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को होने वाली सुनवाई टल गई है। अदालत ने इस मसले पर सभी पक्षों से मध्यस्थता और सुझावों के आधार पर समाधान निकालने की बात कही है। कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन की निगरानी के लिए एक अंतरिम समिति गठित करने का प्रस्ताव भी रखा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 8 अगस्त को होगी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि मंदिर निजी हो सकता है, लेकिन भगवान नहीं। वे सभी के हैं, और श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा सर्वोपरि है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा लाए गए अध्यादेश की संवैधानिकता पर अभी विचार नहीं किया जा रहा है, लेकिन संबंधित पक्षों को सुने बिना अध्यादेश लाना उचित नहीं कहा जा सकता।
यूपी सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराजन ने अदालत को बताया कि सरकार की मंशा मंदिर में हस्तक्षेप करने की नहीं है, बल्कि वहां बेहतर प्रशासन और व्यवस्था के लिए ही ये अध्यादेश लाया गया है। उन्होंने कहा कि बांके बिहारी मंदिर में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु आते हैं, ऐसे में भीड़ प्रबंधन और मंदिर कोष की पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है।
नटराजन ने कहा कि, सरकार का उद्देश्य मंदिर का नियंत्रण अपने हाथ में लेना नहीं है, बल्कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधाओं को सुनिश्चित करना है। उन्होंने अदालत को ये भी बताया कि मंदिर में आय की नियमित जांच और पारदर्शी उपयोग सुनिश्चित करने की दिशा में ये कदम उठाया गया है।
वहीं, मंदिर प्रबंधन की ओर से याचिका दाखिल कर राज्य सरकार के अध्यादेश का विरोध किया गया। याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि मंदिर का संचालन और प्रबंधन एक परंपरा के तहत चलता आ रहा है, और सरकार का इसमें हस्तक्षेप अनुचित है। उन्होंने कोर्ट से कुछ समय की मोहलत मांगी, ताकि वे भी अपने सुझाव प्रस्तुत कर सकें।
सिब्बल ने ये भी तर्क दिया कि अध्यादेश श्रद्धालुओं के हित में नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन पर नियंत्रण स्थापित करने का एक प्रयास है। इसके जवाब में कोर्ट ने कहा कि, श्रद्धालु किसी एक संगठन या समिति के नहीं होते, वे भगवान के होते हैं। मंदिर का उद्देश्य भी वही होना चाहिए, भगवान और उनके भक्तों की सेवा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर समिति से तीखे सवाल पूछे। कोर्ट ने कहा, “मंदिर का फंड सिर्फ समिति के पास रहने की बजाय, श्रद्धालुओं की सुविधा और विकास कार्यों में क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए ? तिरुपति, शिरडी जैसे धार्मिक स्थलों पर बेहतर व्यवस्था का उदाहरण हमारे सामने है।”
कोर्ट ने ये भी जोड़ा कि, प्रबंधन निजी हो सकता है, लेकिन कोई भी देवता निजी नहीं हो सकते। इस कारण सभी हितधारकों की जिम्मेदारी है कि भगवान और उनके भक्तों के लिए बेहतर व्यवस्था की जाए।
कोर्ट ने इस पूरे विवाद के समाधान के लिए एक अंतरिम समिति के गठन का सुझाव दिया है। इस समिति का नेतृत्व किसी रिटायर्ड हाईकोर्ट जज या वरिष्ठ जिला जज को सौंपे जाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस समिति को मंदिर प्रबंधन से संबंधित कार्यों की निगरानी का अधिकार दिया जाएगा, और सीमित फंड के उपयोग की अनुमति भी मिल सकती है।
कोर्ट ने ये भी कहा कि, मंदिर के विकास और भीड़ प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए एक सुव्यवस्थित तंत्र की आवश्यकता है। इसके लिए सभी पक्षों को समिति के लिए नाम सुझाने को कहा गया है, जिससे निष्पक्ष और प्रभावी समिति का गठन हो सके।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मध्यस्थता का भी सुझाव दिया। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि, “जब आप मध्यस्थता की बात करते हैं, तो ध्यान दें कि, भगवान श्रीकृष्ण भी पहले मध्यस्थ थे। इसलिए अदालत पहले मध्यस्थता के प्रयासों को प्राथमिकता देगी।” कोर्ट का इशारा था कि, विवाद को सुलझाने के लिए पहले संवाद और समझदारी के प्रयास किए जाने चाहिए।
अब अदालत ने सुनवाई को 8 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दिया है। तब तक सभी पक्षों को समिति के लिए नाम सुझाने और सुझाव देने को कहा गया है। ये देखना बाकी है कि मंदिर प्रबंधन और राज्य सरकार के बीच इस विवाद का समाधान किस दिशा में आगे बढ़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्राचीन और आस्था से जुड़े मंदिर की गरिमा को बनाए रखने की बात दोहराई है और उम्मीद जताई है कि सभी पक्ष जिम्मेदारी से इस मुद्दे को सुलझाने की दिशा में कदम उठाएंगे।

