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नई दिल्ली
 हॉकी अंपायरिंग को कठिन और संघर्षपूर्ण करियर मानते हुए भारतीय दिग्गजों ने नीदरलैंड्स और बेल्जियम में 15 अगस्त से शुरू हो रहे विश्व कप में तीन दशक बाद एक भी भारतीय अंपायर नहीं होने पर निराशा व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि अंपायरों की संख्या बढ़ाने के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है।

1998 में नीदरलैंड्स के यूट्रेक्ट में हुए विश्व कप के बाद पहली बार टूर्नामेंट के अंपायरों या तकनीकी अधिकारियों में किसी भारतीय को स्थान नहीं मिला है। इस बार सूची में यूरोपीय देशों का दबदबा है। भारत के आरवी रघु प्रसाद, सतिंदर शर्मा, तरलोक सिंह भुल्लर और अमरजीत सिंह बावा विश्व कप में अंपायरिंग कर चुके हैं।

पिछले साल 47 वर्ष की आयु में संन्यास लेने वाले रघु प्रसाद ने कहा कि बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरों की नियुक्तियां एफआइएच अंपायरिंग समिति करती है, जिसमें पिछले बड़े टूर्नामेंटों और प्रो लीग में प्रदर्शन मानदंड होता है। हमने यूरोपीयों के बीच अपनी पहचान बनाई थी, जो आसान नहीं था। रघु ने कहा कि अंपायरों को पुरस्कार या वेतन नहीं मिलता, जबकि खिलाड़ियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद पुरस्कार और सरकारी नौकरी मिल जाती है

हॉकी इंडिया की वेबसाइट पर मई 2025 में अपडेट की गई सूची के अनुसार, अंपायरों की चार श्रेणियां हैं। कोर लीडिंग पैनल, लीडिंग पैनल, हाई पोटेंशियल और नेशनल अंपायर। पुरुष वर्ग में 100 से अधिक और महिला वर्ग में 70 से अधिक नाम दर्ज हैं। पुरुष वर्ग में छह एफआइएच पैनल के अंपायर हैं, जिनमें से रघु प्रसाद रिटायर हो चुके हैं।

सतिंदर शर्मा ने कहा कि अंपायरों को अधिक एक्सपोजर देना होगा। घरेलू अंपायर बड़े टूर्नामेंटों में अंपायरिंग नहीं करेंगे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव कैसे मिलेगा। उन्होंने सही प्लानिंग और ढांचे की आवश्यकता पर जोर दिया ताकि अगले विश्व कप या ओलंपिक में भारतीय प्रतिनिधित्व हो सके।

1994 में अंपायरिंग से विदा लेने वाले बावा ने कहा, उस समय अंपायरों को खेल का हिस्सा नहीं माना जाता था। उन्होंने कहा, हमने सुनिश्चित किया कि अंपायरों को भी सम्मान और स्मृति चिन्ह दिए जाएं। तीनों दिग्गजों ने कहा कि इस पेशे में वित्तीय सुरक्षा नहीं है और महज जुनून के लिए वे इससे जुड़े रहे हैं। शर्मा ने कहा कि हमारे समय में 150 या 200 रुपये रोज और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 40-50 डॉलर भत्ता मिलता था।