कथावाचक अनिरुद्धाचार्य पर संतों की प्रतिक्रिया
कथावाचक अनिरुद्धाचार्य इन दिनों अपने विवादित बयानों को लेकर आलोचना के केंद्र में हैं। उनके कथित तौर पर कन्याओं को लेकर दिए गए एक बयान ने न सिर्फ आम लोगों को आहत किया है, बल्कि संत समाज में भी तीखी प्रतिक्रिया पैदा की है। इस बयान को लेकर सोशल मीडिया से लेकर संत समागमों तक, चारों ओर निंदा की लहर देखने को मिल रही है।
बयान वायरल होने के बाद जहां कथावाचक अनिरूद्धाचार्य का स्पष्टीकरण सामने आया, वहीं अब जगतगुरु परमहंस आचार्य महाराज की तीखी प्रतिक्रिया ने पूरे विवाद को नया मोड़ दे दिया है। वृंदावन पहुंचे परमहंस आचार्य ने कहा कि, अनिरुद्धाचार्य को या तो ज्ञान का अभाव है या फिर पैसों का घमंड सिर चढ़कर बोल रहा है।
परमहंस आचार्य ने अनिरुद्धाचार्य और प्रेमानंद महाराज दोनों के बयानों पर नाराज़गी जाहिर की। उन्होंने कहा,
“मैं अयोध्या श्रीराम की नगरी से आया हूं और अब श्रीजी की नगरी वृंदावन पहुंचा हूं। यहां आकर पता चला कि, कन्याओं को लेकर असंवेदनशील टिप्पणी की गई है। मैंने जब ये बात सुनी, तो मुझे गहरा कष्ट हुआ।”
परमहंस आचार्य ने प्रेमानंद महाराज को राधा रानी का सबसे बड़ा भक्त बताया, लेकिन उनके बयान को “अत्यंत पीड़ादायक” बताया। उन्होंने कहा कि.
“मुझे स्वयं राधारानी ने संकेत दिया कि, उन्हें दुख हुआ है। जिस दिन वो शब्द बोले गए, उस दिन श्रीजी रो रही थीं। कन्याएं श्रीजी का ही रूप होती हैं। उन पर टिप्पणी करना ईश्वर पर ही टिप्पणी करना है।”
अनिरुद्धाचार्य को लेकर परमहंस आचार्य की टिप्पणी और भी अधिक सीधी और तीखी रही। उन्होंने कहा:
“या तो उन्हें ज्ञान नहीं है या फिर उन्होंने जो कम उम्र में धन और प्रसिद्धि हासिल की है, उसका घमंड उन्हें घेर चुका है। यही कारण है कि वे शब्दों की मर्यादा भूल बैठे हैं।”
उन्होंने ये भी कहा कि, संतों और कथावाचकों को अपने कथन में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि वे समाज को दिशा देने वाले होते हैं।
“यदि संत समाज ही अपने शब्दों से आहत करने लगे, तो फिर आम लोगों से क्या अपेक्षा की जाए?”
परमहंस आचार्य ने दोनों संतों से सार्वजनिक माफी की मांग की है। उन्होंने कहा:
“मैं चाहता हूं कि, अनिरुद्धाचार्य और प्रेमानंद महाराज दोनों समाज के समक्ष आकर क्षमा मांगें और संकल्प लें कि भविष्य में ऐसी कोई भी टिप्पणी नहीं करेंगे। अन्यथा ये समाज कभी उन्हें माफ नहीं करेगा।”
उन्होंने ये भी कहा कि, भक्ति और प्रवचन का कार्य बेहद पवित्र है और इसमें भाषा की मर्यादा बनाए रखना संतों की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
ये विवाद केवल दो संतों के बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ये उस व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण को भी सामने लाता है जहां धार्मिक मंचों से की गई बातें समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं। खासकर जब बात कन्याओं की हो, तो बयानबाजी में लापरवाही और भी अधिक गंभीर मानी जाती है।
अनिरुद्धाचार्य के बयान के बाद से ही सोशल मीडिया पर तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई धार्मिक अनुयायियों ने उन्हें अपमानजनक भाषा के लिए आड़े हाथों लिया। कुछ जगहों पर उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी हुए।
प्रेमानंद महाराज के बयान को लेकर जहां एक वर्ग ने उन्हें सही ठहराया, वहीं परमहंस आचार्य जैसे वरिष्ठ संतों की आलोचना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ये मामला केवल शब्दों का नहीं, बल्कि संतों की गरिमा से भी जुड़ा है।

