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तेहरान
ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने कहा है कि अमेरिका जब तक अपने व्यवहार में सुधार नहीं करता, होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोला जाएगा। इस नए रुख के साथ ईरान ने जलमार्ग और वहां होने वाले आवागमन को लेकर किसी समझौते के लिए बातचीत को प्रभावित करने वाली नई शर्तें रख दी हैं। ईरान के सरकारी प्रसारक ने परिषद के सचिव एवं रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर मोहम्मद बाघेर जुलघद्र का बयान प्रसारित किया। बयान में कहा गया कि अमेरिका को दोबारा कभी ईरान को धमकी नहीं देनी चाहिए और उसे ईरान तथा क्षेत्र में उसके सशस्त्र सहयोगियों के साथ जारी युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करना चाहिए।

रखी हैं कई शर्तें
इसमें कहा गया कि अमेरिका को ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए नौसैनिक प्रतिबंध को हटाना होगा। साथ ही क्षेत्र से अपनी सैन्य मौजूदगी वापस लेनी होगी। बयान में यह भी कहा गया कि इसके अलावा उसे युद्ध से हुए नुकसान की पूरी भरपाई करनी होगी। प्रतिबंध हटाने होंगे और ईरान की जब्त की गई संपत्तियों को बिना किसी शर्त जारी करना होगा। अमेरिका की ओर से इस पर फिलहाल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अमेरिका ने पूर्व में कहा था कि वह होर्मुज की नाकाबंदी समाप्त करने से पहले वहां की व्यवस्था को लेकर एक स्वीकार्य समझौता चाहता है। ईरान ने इससे पूर्व कहा था कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन को लेकर ओमान के साथ एक समझौते के करीब पहुंच गया है।

पाकिस्तान ने इजरायल को बताया खतरा
उधर, सऊदी अरब और तुर्की के साथ त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने के अगले ही दिन पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक बार फिर इजरायल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्होंने इजरायल को पूरे मुस्लिम जगत के लिए खतरा बताते हुए उसके खिलाफ एकजुट सैन्य मोर्चा बनाने का आह्वान किया।

स्थानीय मीडिया से बातचीत में आसिफ ने कहाकि इजरायल के मुद्दे पर सभी मुस्लिम देशों को एकजुट होना ही होगा, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। इजरायल को अवैध देश करार देते हुए उन्होंने दावा किया कि इजरायल बाल्फोर घोषणापत्र की देन है, जिसे 1940 के दशक में एक अवैध राष्ट्र के रूप में स्थापित किया गया था। यह क्षेत्र के किसी भी देश के लिए सीधा खतरा बन सकता है।

गौरतलब है कि 1917 में बाल्फोर घोषणापत्र जारी होने के समय इस क्षेत्र का आधिकारिक नाम ‘फिलिस्तीन’ था। यह तब तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के अधीन था। ब्रिटिश सरकार ने इसी क्षेत्र में यहूदियों के लिए एक राष्ट्र बनाने का समर्थन किया था, जिसके तीन दशक बाद 1948 में इजरायल की नींव पड़ी। अतीत में भी इजरायल को पाकिस्तान ‘मानवता के लिए अभिशाप’ और कैंसर जैसा देश बता चुके आसिफ ने कहाकि 27 अक्टूबर को होने वाले चुनावों में अगर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हार भी जाते हैं, तब भी इजरायल के अस्तित्व के खिलाफ उनका कड़ा विरोध नहीं बदलेगा।